बुधवार, 4 जनवरी 2017

नूतन वर्ष पर विशेष

नवल पुष्प है अनूदित रसना, कर्मों का उदगम् हो  
                         चेतना।
ऐसी पावन मधुर बेल में,नववर्ष मुबारक हो मितवा।
पुष्पित हों अधराधर तेरे,दावानल संताप मिटे।
मिले अमरता निज प्रसाद में, दैनिक उच्छावास दिखे।

कल्पलता भी बने मनोहर, अनुसीलन हो शिक्षा का।
हर पल हो सृष्टि भावों की,अन्तःस्थल हो भृगु सा।
मन चंचल हो वशी आपका,बंधे नेहकुल रेशम सा।
मर्दुल कंठ उच्चरित करें, नववर्ष मुबारक हो मितवा।
            नववर्ष मुबारक हो मितवा।

नववर्ष जगाये हर्ष प्रेम, उल्लास सदा प्रस्फुटित रहे।
उदयाचल हो सद्वृत्ति कथा,निष्काम मनोरथ सजे रहे।
उद्दीप्त रहे हनुमत प्रभाव, हर कर्मक्षेत्र में अव्वल हो।
मंगलकारी हो संवत्सर,परिजन भी  सुखी संपन्न बने।

चंद्रसेन"अनजान"

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