गुरुवार, 19 जनवरी 2017

गुरु को समर्पित एक पत्र

निज गुण अवगुण त्याग तात मैं तेरे शरण को धाया था।
मैंने तो सादर प्रणाम गुरु चरणों तक पहुँचाया था।
मैं मन चंचल हीन बिचारी खोट सहस्र हजारी था।
मन ही मन में घोर आश्चर्य क्यूँ  प्रभू आपने धारया था।
हमने तो मुस्कान बिखेरी पर पारा नहीं बढ़ाया था।
दंडवत प्रणम्य उद्गम्य शिखा कंचन का बोध कराया था।
बदले में आशीर्वचनों का कवच मनोहर माँगा था।
पर प्रभु हमने कभी नही यूँं जिह्वा को कल्पया था।
श्रापों के ऊपर श्राप दिए पर डर कर न घबराया था।
क्या भूल भूलमें भूल हुआ।
क्या फूल चुभे जो सूल हुआ।
क्या मर्म दुःखें जो दर्द हुआ।
क्या शिष्य बुरे जो क्लिश्य हुआ।
परसुवंश अवतंश आप है गुरु हमारे।
सुधियों में है सुधी आप है गुरु हमारे।
वक्ताओं में प्रवक्ता आप है गुरु हमारे।
गुरुओं में है गुरु आप हैं गुरु हमारे।
अब जो भी कलुषित कर्म किये सब माफ करो।
हम है अधमी है खल पापी पर गुरु आप सब माफ करो।
एक नई दिशा उपदेश थम्हा सब माफ करो।
अब करुण निवेदन एक कि गुरु सब माफ करो।

चंद्रसेन अनजान

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