रविवार, 8 जनवरी 2017

ट्रेन दुर्घटना पर कविता

सूर्य उदित होते ही ऐसा समाचार था आया।
काल ने ऐसा नाद किया कि घोर अँधेरा छाया।
बच्चे बूढ़े और जवान सबके सब थे परेसान।
इंदौर और पटना एक्सप्रेस पर था यमदूतों का महाकाल।

ऐसी घनघोर तबाही में,वो आश कहीं थी भटक गई।
जो कल तक देखा करती थी,अरमान सुरक्षित सफरों की।
वो किलकारी जो थी प्यारी,पल भर में ही तो दूर हुई।
क्यों मम्मी पापा दादा और दादी से भी महरूम गई।

अब हर घटना की राजनीति करना नेता जी बंद करो।
हो सके देशहित में तो कुछ रहने खाने का  यत्न करो।
उज्जवल भविष्य कीआशायें,हम देख नहीं सकते अब है।
यदि संभव हो हे कर्मवीर!  लौटा दे मेरे प्राणासीन

चंद्रसेन "अनजान"

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