गुरुवार, 19 जनवरी 2017

हास्य् व् श्रृंगार


आज कल के सामाजिक परिवेश से जुड़ा हास्य्

मुख है क्यूँ लटका हुआ जी आम की तरह।
चलते हैं आगे पीछे बॉडीगॉर्ड की तरह।
इनको जी ऐर गै न ये यार हैं समझों।
ये हँसने वाले बैंड हैं हसबैंड न समझो।

लड़कियों के आगे पी्छे चलने वाले लड़कों को समर्पित

जबाब देने में देरी को इनकार मत समझना।
मुस्कुरा बस दे तो इसे  प्यार मत समझना।
मालूम है सरीफ नहीं हूँ मैं भी यहाँ।
पर सर्द ओस की बूंदों को बारिश भी मत समझना।

जो ऑनलाइन होकर भी चैट ऑफ किये फिरते है।
मोहब्बत की गलियों में अभिमान लिए फिरते है।
ऐसे छलिये को रुक्सत जहाँ तन्हाई मिले।
ख़रीदे जो दाल तो साथ में कणकाई मिले।

गैर की बातों को तुम ध्यान क्यूँ देती हो।
दहसत की इनायत को सम्मान क्यूँ देती हो।
वो तो कातिल है रिंदे के मोहताब का।
फिर भी तुम उसे इतना अधिकार क्यूँ देती हो।

दिल की कूँचों की किलकार हो तुम।
बसंत की भीनी कोकिल बयार हो तुम।
कल से जो छुप छुप के देख रही हो ,
लगता है मेरे इश्क की परवान हो तुम।

आप सभी के खिदमत में....

अपने  इरादों से अपनी तकदीर लिखेंगे।
शांति से ही हाथो में नई लकीर मढ़ेंगे।
हम सूरज की तप्त  अनल आहुती।
लोहों को गला इतिहास रचेंगे।
चंद्रसेन "अंजान"

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